मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

॥आरक्षण और राजपूत॥

क्षत्रियोँ करना होगा ईस आरक्षण का अन्त ।
हिम्मत नहीँ करोगे तो क्या करने आयेगा 
अन्त कोई सन्त॥

आरक्षण मिले गरीब को उसपे हमे कोई एतराज नहीँ है।
बैठा हे सिँहासन पे और
मारे गरीब का हक वँहा पे हमारा एतराज सही है॥

हुँकार भरो साथियोँ अब हमे अपने हक के लिये
लङना पङेगा।
खूब देख लिया अपने नेताऔ के सामने अब तो
ईन जालिमो से अङना पङेगा॥

खूब लिखी तलवारो से कहानियाँ आब तो हमे
तकनीक को पढना होगा।
खुब करी हाथी घोङो की सवारी अब तो हक
मारने वालो की छाती पे छढना होगा॥

देखो ईस आरक्षण मेँ कछुआ खरगोश को पछाङता है।
40% वाला मेरिट धारक के ऊपर रोब झाङता है॥

क्या मेरे युवा मित्रो हम ईसी तरह सफेद पोसो
के आगे घुटने टेकते रहैँगे।
और एक अभ्यागत की तरह तरसती आँखो से
अपनी बरबादी देखते रहेँगे॥

माँगने से मिलती है भीख अपना हक है यारो उसे
छीनना सीख लो।
छोङो हमारे समाज के ईन बगुला भक्त नेताऔ को और
हँसो की तरह मोती बीनना सीख लो॥

जय क्षत्रिय ॥
हिम्मत वाले टकरा जाते है मुल्क के शँहसाओ से।
अकेले जो हिम्मत रखते है हिमालय को उठाने की अपनी बाँहो से।

दुर्गादास जी ने टक्कर ली थी सदी के सम्राट से।
अकबर की भी रुह काँपती थी महाराणा की गुर्राहट से॥ 

आज भी हम नाम लेते है जब उन वीर राजपुतो का।
कलेजा काँप जाता है आज भी यम के दूतो का॥

गर्व से कहो की हम वो ही वीर राजपूत है ।
लाज रखी थी मात्रभौम की हम हिन्द के वो वीर सपूत है।

जय क्षत्रिय॥
जय क्षात्र धर्म॥
!!"राजपूत है हम"!!
कहते तो हम सब है की राजपूत है हम ,
मानवता की लाज बचाने वाले हिन्द के 
वो सपूत है हम ।

पर वो क्षत्रियोचित सँस्कार अब कँहा है ।
वो राणा और शिवाजी की तलवार अब कँहा है॥

बेटे तो हम उन मर्यादापुरुषोत्तम राम
के वँश के है ।
और राणा शिवाजी और दुर्गा दास जी के
अँश के है ॥

तो फिर राम का मर्यादित जीवन अब कँहा है ।
राणा और दुर्गादास जी के जैसी लगन अब कँहा हैँ ॥

दानी कर्ण और राजा शिवी का नाम हम लेते है ।
भागिरथ और सत्यवादी हरिश्चन्द्र की साख हम
दूनियाँ को देते है॥

तो फिर भागिरथ जैसा तप अब कँहा है ।
झुकाया था भगवान को सत्य के आगे वो
सत्य का अवलम्ब अब कँहा है ।

हमेँ गर्व है की हम शर कटने पे भी लङते थे ।
खेल खेल मेँ ही हमारे वीर जँगली शेरो से अङते थे।

जिस सत के सहारे धङ लङते थे वो सत
अब कँहा है ।
आज वो हजार हाथीयोँ का अथाह बल
अब कँहा है।

सतयुग, त्रेता और द्वापर तो क्षत्रियोँ के स्वर्ण युग रहै ।
कलयुग मे भी आज तक क्षत्रिय श्रेष्ठ रहे चाहै
उन्होने कठिन कष्ठ सहै ॥

पर सोचना तो हमे है जो क्षत्रिय धर्म
और सँस्कार भूल रहै ।
देख रहा हुँ आज शेर भी गीदङो की
गुलामी कबूल रहै है

अब तो ईस राख मे छुपे अँगारे
को जगा लो साथियोँ ।
जिस धर्म ने महान बनाया हमे
उसे अपनालो साथियोँ ।
जय क्षत्रिय ॥
जय क्षात्र धर्म ॥
जो भूल जाये धर्म को वो 
धर्मदूत हो नहीँ सकता।
जो भूल जाये गजनी की
धूर्तता को वो राजपूत हो
नहीँ सकता॥

राजपुत अगर हो तो 
क्षत्रिय धर्म मे रहना 
जरुरी हैँ।
खून मे हे रजपूती तो 
क्षत्रिय धर्म को महान
कहना जरुरी हैँ॥

आज कोशिस हो रही
क्षत्रिय धर्म को भुलाने की।
जो हकदार है सिँहासन के
उन्है छोङ अधर्मियोँ को
बुलाने की॥

आज हमे जरुरत है
क्षत्रिय धर्म और सँस्कारो
को अपनाने की ।
राणा वाली रजपूती है
अभी भी कायम दुनियाँ
को ये बतलाने की