हिम्मत वाले टकरा जाते है मुल्क के शँहसाओ से।
अकेले जो हिम्मत रखते है हिमालय को उठाने की अपनी बाँहो से।
दुर्गादास जी ने टक्कर ली थी सदी के सम्राट से।
अकबर की भी रुह काँपती थी महाराणा की गुर्राहट से॥
आज भी हम नाम लेते है जब उन वीर राजपुतो का।
कलेजा काँप जाता है आज भी यम के दूतो का॥
गर्व से कहो की हम वो ही वीर राजपूत है ।
लाज रखी थी मात्रभौम की हम हिन्द के वो वीर सपूत है।
जय क्षत्रिय॥
जय क्षात्र धर्म॥
अकेले जो हिम्मत रखते है हिमालय को उठाने की अपनी बाँहो से।
दुर्गादास जी ने टक्कर ली थी सदी के सम्राट से।
अकबर की भी रुह काँपती थी महाराणा की गुर्राहट से॥
आज भी हम नाम लेते है जब उन वीर राजपुतो का।
कलेजा काँप जाता है आज भी यम के दूतो का॥
गर्व से कहो की हम वो ही वीर राजपूत है ।
लाज रखी थी मात्रभौम की हम हिन्द के वो वीर सपूत है।
जय क्षत्रिय॥
जय क्षात्र धर्म॥
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