बुधवार, 14 अगस्त 2013

पी दारु गेला हुओ , जद हँसे दूनीया रा लोग।
घर ग्रस्ती मे विगन पङै और शरीर मे लागे घणा रोग॥

कईयो रा घर गया , अर कईयोँ रा गया टाबरीया।
कई तो जिन्दगी सूँ गया, पर ए पीवणियाँ नी सुधरीया॥

लाख टका रो मानवी , करोङ टका रो मान।
दारु पी रोळा करे ,हो जा खोटे टके समान॥

तन गळे ,धन रुळे अर मिनख रेवे आगा।
दारु पी गलीयाँ मे पङे जद कुत्ता लारे लागा

मिनख पणो राखणो,नी पीणो ओ दारु ।
कङवो घूँट पी लेवणो , घर टाबरीयाँ सारु॥

नारायण के सुणलो भायाँ, दारु नी पीवणो ।
नीरोगो
शरीर रेवसी , ईज्जत सूँ होसी जीवणो 
हरिनारायण सिँह राठौङ

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

जब क्षत्रिय शाषन करता था।
तो पुरा जगत भारत से डरता था॥

धीरे धीरे क्षत्रिय धर्म का लोप हुआ।
तब से अधर्मीयोँ का यँहा प्रकोप हुआ।

क्षत्रियोँ ने अपने धर्म और सँस्कारो को जब से छोङा है।
राम की मर्यादा और सत्य के बन्धन को जब से हमने तोङा है॥

जब से दुनीयाँ हमारा अपमान खुलेआम करती है।
भुगत रही है जनता आतँक की टोलीया उनका कत्ल खुलेआम करती है॥

लाखो तारो से भी एक सूरज का तेज भारी है।
क्योकी पथ नहिँ बदला है सुर्य देव ने इसिलिये उनका तेज आजतक जारी है॥

आह्रवान करता हु अपनालो क्षत्रिय धर्म और सँस्कारो को।
उठालो हनुमान की तरह बीङा देश से बाहर कर दो देश के गद्दारो को॥

जिस दिन सोया हुआ क्षात्र धर्म जाग जायेगा।
पाप, अधर्म और अन्याय अपने आप देश छौङ के भाग जाएगा॥
जय क्षत्रिय धर्म॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय भारत माता॥
हरीनारायण सिँह राठौङ
आज कुछ एसी बाते है जो हमे पीछे धकेल रही है " की तुम राजपूत हो के ये करते हो,तुम्हे तो ये करना चाहिये।राजपूत हो के पीते और खाते नहीँ हो केसे राजपुत हो। और अरे भाई आप तो राजपूत हो आपका क्या कहना आप तो राजा है,आप की तो क्या बात है आप तो भाभा है "
और कर देते है हमारा बँटाधार।

साथियो अब हमे इन बातो से आगे बढना है और नये युग का निर्माण करना है क्योकी साथियो देवता भी नियत समय के बाद अपनी जगह बदलते है नाम बदल के अवतार लेते है।हमे भी क्षत्रियो के प्रती दुनिया की एक नई सोच का निर्माण करना है। जिसमे हमारा गौरव ओर शान झलकती हो।

नया युग बनायेँ।
साथीयो कदम बढायेँ॥
जय क्षत्र धर्म।
जय क्षत्रिय।
हरिनारायण सिँह राठौङ
कङवी बात॥
ये बात 16 आना सच है की राजपूत महान है,थे और रहैँगे हम एसा कहते रहे, अपने समाज मे तलवार की गाथा गाते रहै और बाहर से कुछ मुठ्ठी भर मुल्ले आये घोङो पे छढ के और हमारा भारत हमसे छीन लिया और हम हमारी गाथा गाते रहै।

ये भी सत्य है की उन्होने कई बार मूँह की खाई पर "करत करत अभ्यास के जङ मत होत सुजान" के भाव से लगे रहै और सफल भी हो गये और हम महानता को लिये बेठे रहै। क्यो की उन्होने जान लिया था कि सीधी लङाई मे हमे हराना आसान नही है तो आपस मे लङाया छोटा मोटा बनाया। कुछ को अपने साथ रखा और कुछ को सामने। और ये सिलसिला 1000 साल स अनवरत जारी है।
आदमी एक बार ठोकर खा जाये तो सुधर जाता है परन्तू क्षत्रिय 1000 ठोकरे लगने के बावजूद आज तक नही सुधरा है और आज भी ये राजनितिक लोग अपने फायदे के लिये हमे स्तेमाल करते है और हम जिस डाल पे बेठै है उसी को काट रहै है।
हम महान थे,है पर आगे कैसे रहैगे ईसके बारे मे सोचना है।महान महान कहने से कोई महान नही बनता उसके लिये महाराणा के जैसे तपना पङता है।महाराणा की जय हम रोज बोलते है परन्तु उनके जैसा बनने की कोसिस कोई नही करता।और कोई विरला हिम्मत कर भी ले तो हजारौ आ जाएँगे टाँग खीचने के लिये।आज सबको लीडर बनना है।ठीक उसी प्रकार हमारे को दबाने को अगर कोई आवाज उठती है तो हजारो आ जाएँगे उनके साथ इस बात को क्षत्रिय समाज समज नही रहा है।
साथियोँ हमे इस बात को समजना पङेगा कि जिस सँस्कृती और गौरव को बचाने के लिये लाखो क्षत्रियो ने कुर्बानीया दी, लाखोँ क्षत्राणियो ने अपने आप को आग के हवाले कर दिया आज वो समाज और सँस्कृती खतरे मे है और हम युवाओ को इसके लिये आगे आना पङेगा। साथियो हम जय राजपुताना का नारा तो लगाते है पर इसके साथ साथ हमे हमारी कमीयो को भी स्वीकार करना पङेगा।और हमे सिर्फ क्षत्रिय की बात करने के बजाय सबको साथ लेके चलने की बात करे। क्योकी ये ही हमारी परँपरा है।औय सदीयो से चली आ रही है।क्षत्रियो ने पुरे विश्व का नेत्रत्व किया है, एक छत्र राज करने का गौरव भी क्षत्रियौ को प्राप्त है। भारत विश्व गुरु और सोने की चिङिया क्षत्रियो के शाषन मे ही रहा है।और हमे अपने प्रयासो सै पुन: उस गौरव को पाना है

ना तो कोई छोटा ना कोई बङा है।
हर एक अपने भारत के लिये लङा है॥
आज फिर अपने वतन को हमारी जरुरत पङी है।
भष्ट्रो की सेना देखो सामने तन के खङी है॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षत्रिय॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
॥कङवी सच्चाई॥
क्षत्रिय मित्रो कहते है, की जब बारिश होती है तो जो बादल हवा के विपरीत दिशा मे चलता है, वो ही मुशलाधार बरसता है, और जो हवा के साथ चलता है उसको हवा बिखेर देती है। और वो बादल एक बुन्द भी नहीँ गिरा सकता। आज ठीक यही स्थिती क्षत्रिय समाज की है जो समय के साथ हो लिया है और समय के फेर ने हमे पुरी तरह से बिखेर दिया है।

वरना एक समय था जब पूरी पृथ्वी पर क्षत्रियो का राज था। गँगाजी को धरती पे लाने का और ईस धरती को पापीयो से मुक्त करने का श्रेय भी क्षत्रियो को ही जाता है।क्योकि उस समय भागीरथ जैसे दृड्ढ निश्चियी और तपसवी क्षत्रिय हुए जिन्है ईँद्र की अपसराए तक विचलित नही कर सकी थी और वो भागीरथी गँगा को धरती पर ले आये थे।
परन्तु आज मुजे बङे अपसोस के साथ लिखना पङ रहा है की उन्ही भागीरथ के वँशज क्षत्रियो के बारे मे लोगो की धारणा है की ये तो राजपूत है एक बोतल मे काम हो जायेगा, एक बोतल पीला दो लङाई कर लेगा परीणाम चाहै जो भी हो। बताओ साथीयो क्या ये भागीरथ,मर्यादापुरुषोतम राम,महाराणा प्रताप,दुर्गादास और सत्यवादी हरिश्चन्द्र के वँशजो के लक्षण है।
अरे जिन्है तीन लोक का राज्य भी नहीँ बदल सकता था उन्हे एक गिलास गँदा पानी बदल रहा है कितनी शर्म की बात है।

मे ये नही कहता की सभी राजपूत एसे होते है आज समाज के लिये मरने वालो और क्षत्रिय धर्म के अनुशार चलने वालो की भी कमी नही है परन्तु साथीयो एक सङा सेब पुरी टोकरी को सङा सकता है।
इसिलिये क्षत्रिय साथियो समय के साथ ना चलके समय को अपने साथ चलायेँ और अपने गौरवमयी ईतिहास का सदा स्मरण रखे और कीसी भी परिस्थिती मे अपने ईतिहास को कलँक लगे एसा काम ना करे और ना होने दे।
जिस शराब ने हमारे समाज को गर्त मे धकेला है उसका परित्याग करे और सभी प्रकार की बुराइयो से दुर रह के क्षत्रिय धर्म का पालन करै फिर ईस दुनिया मे राम राज्य को आने से कोई रोक नहीँ सकता।
क्षत्रिय धर्म के पालन के कारण ही तो कहा गया है

रघूकुल रीत सदा चली आई।
प्राण जाये पर वचन ना जाई॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षात्र धर्म॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
 
क्षत्रियोँ की जरुरत-समय के साथ बदलाव।
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षत्रिय॥
साथियो आज हमे ये सोचने की जरुरत है की आज हमारी एसी कोनसी कमिया है जिनकी वजह से आज हम लोग पिछङ रहै है। एक समय था जब क्षत्रियोँ का धरती पे भगवान के बाद दुसरा स्थान था। उसका कारण ये था की उस समय क्षत्रिय अपने धर्म और अपने कर्म के प्रती निष्ठा रखता था।ओर लोग भी हमे पुरा आदर देते थे।अपनी जान पे खेल के भी शरणागत की रक्षा करना प्रजा को बेटे से भी ज्यादा तरजीह देना अपना कर्त्तव्य था।

तलवार हमारा प्रीय आभुषण हूआ करती थी।परन्तू अब जमाना पुरी तरह बदल चुका है, अब हमे तलवार की जरुरत नहीँ है बदलाव की जरुरत है।समय के साथ ना बदलकर ही तो हमने बहुत धोका खाया है, हमारे राजाओ ने बन्दुको और तोपो का सामना तलवारो से किया फिर भी उन्होने दुश्मन को नानी याद दिला दी ,जरा सोचे साथीयो अगर उस समय महाराणा के पास अकबर के जैसा तोपखाना हो तो अकबर भारत मे नहीँ टिक सकता था।

पहले हम हर क्षेत्र मे पारँगत होते थे ओर आज भी हमे हर क्षेत्र मे आगे रहना पङेगा तभी हम अपने समाज के अस्तित्व को बचा पायेँगे।साथियो पहले हमारा मुकाबला तोपो और बन्दुको से था जो हमने समय के साथ ना बदलकर हार दिया।परन्तु साथीयो आज हमारा मुकाबला इस आरक्षण और राजनेतिक व्यवस्था से है जिसमे हम आज तक तो पिछङ रहै है।राजनीति मे पिछङने एक ही कारण है की हमे चमचागिरी और चापलुसी करना नहीँ आता, और वो हमारे खून मे भी नहीँ है।परन्तु साथियोँ हमारे पास जो जुबान है जिस राजपुती बोली और अपणायत की दुनिया कायल है सबको साथ लेके चलने की ताकत जो हजारो वर्षो से हमारे खून मे है उसे अपना कर हमे समय के साथ चलना होगा।

मित्रो आज हमे इस समय की माँग के अनुशार समय की बारीकियो और चालाकीयो को सीखना होगा।आज हमारा दुर्भाग्य है की बेशाखीयो का सहारा ले के चलने वाले हम तलवार की धार पे चलने वालो को पछाङ रहै है। साथीयो जो बेल कीसी के सहारे से चलती हे वो छाया तो गहरी कर सकती है परन्तू जो पेङ खुद के तने के सहारे खङा होता है उसका मुकाबला नहीँ कर सकती है,साथीयो समज जाइये।

हमारे पुर्वजो ने जो आधार स्तम्ब हमे दिया है हम उसके अनुशार चलेँ ओर अपनी एकता को बरकार रखेँ,तो मित्रो हमे जमाने की कोई भी आँधी हिला नहीँ सकती है।
भाईयो हमे समय की माँग को स्वीकार करते हुए अपनी एकता को बनाये रखना है और समय के बदलाव को स्वीकार करना है।
जय क्षात्र धर्म॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
जँहा वन्देमातरम का अपमान होता है,
तब भी मेरा देश आँखे बन्द कर के सोता है॥

जँहा मेरे गरीब भाई का बेटा रोटी के लिय रोता है।
और मेरे देश का नेता 5स्टार एसी मे सोता है।

क्या लिखु मे जँहा नेता रोटी तो मेरे देश की खाता है।
पर गीत वो पङोसी के गाता है

जँहा दुध दही और घी की नदीया बहती थी।
सारी दुनीया जिसै विश्व गुरु कहती थी।

वँहा आज पाप,अधर्म और भश्ट्राचार का बोलबाला है।
जो बाहर से दिखता है धवल चाँदनी सा भीतर वो कोयले से भी काला है।

जँहा शहीदो को भुलाया जाता है।
देश द्रोहीयोँ को खाने पे बुलाया जाता है।

रोना आ रहा है मित्रो मेरे को मे और लिख नहीँ सकता।
भूखा रह लेगा पर देश का आम गरीब बिक नही सकता॥
॥जय जय हिन्दुस्तान॥
॥वन्देमातरम॥
 
शेरो की दहाङ आज भी वेसी ही है,
गाय के दुध मे मिठास आज भी वेसी ही है।

कोयल आज भी मीठी वाणी बोलती है,
पपीहे की पीहू कानो मे शहद घोलती है।

सूरज वही,चँदा वही धरती माता भी वही है।
नदीया, झरने और पर्वत भी अपनी जगह पे सही है।

तो फिर क्षत्रियो की आन, बान और शान कँहा गई है ??
क्योकी-

हमने क्षत्रिय पथ के सारे बन्धन तोङ दिये।
धर्म नीती और सँस्कार सब हमने छोङ दिये।

नेता बन गये,अँहकार मे तन गये, अपना पराया सब भूल रहे।
मुठ्ठी भर नोटो की खातिर गेरो की बाहो मे देखो झूल रहै।

पहले छल,कपट और दारु ने हमारी कमर को तोङ दिया।
जिनको चुना नेता अपना अब उन्होने भी साथ को छोङ दिया।

अब भाई से भाई को जोङ देँगे,झुठे अँहकार को तोङ देँगे।
आँधियो के रूख को मोङ देँगे, उँगली उठाये अपनी तरफ उस उँगली को तोङ देँगे।

एक हमे अब होना है,खो चुके बहूत और कुछ नही अब खोना है।
॥जय क्षात्र धर्म॥
आपका-हरिनारायण सिँह राठौङ खुडियाला
धिन है वो माता जिसने राणा जेसे शेर को दुध पिलाया था।
काट काट दूश्मन को जिसने क्षात्र धर्म को बचाया था।

धिन है हल्दीघाटी की वो माटी जिसका तिलक राणा ने लगाया था।
धिन है राणा की वो छाती जिसने बेरी से मिले भाई को गले लगाया था।

धिन है चितौङ का वो गढ जँहा राणा ने केशरीया लहराया था।
धिन धिन है वो चेतक जिसपे चढ के राणा ने घमासान मचाया था।

धिन है राणा का वो भाला जिसै राणा ने रण मे सम्भाला था।
धिन है वो तलवार जिसको राणा ने म्यान से निकाला था।

राणा की पाग की महीमा मे कर नहि सकता ।
ईतनी ऊँची शान है उस पाग की मेरे शब्दो से मे भर नही सकता।

उस पाग की महीमा मे क्या करु,जिसे झुकाने को अकबर सारे जतन कर गया।
झुका तो वो नही सका, पर ईसे वो अकबर नमन कर गया।

धिन धिन है भारत की ये भुमी जँहा राणा ने अवतार लिया।
नारायण नमन करे राणा को,जिसने क्षात्र धर्म का जयकार किया।
॥जय क्षात्र धर्म॥
हरीनारायण सिँह राठोङ
कीसने कह दिया की राजपुत एक हो नही सकते ।
हाँ ये सही है की बँजङ खेत के अन्दर बीज बो नही सकते।

झाङीयो को काट के खेत को सुधारा जाता है।
कोई भी हो सँकट मे तो क्षत्रीयो को पुकारा जाता है।

हो सकता है शेर गहरी नीँद मे सो गया है।
थोङे समय के लिये क्षत्रीय भी कहीँ खौ गया है।

अब हमे वो हूँकार भरनी है जो महाराणा ने भरी थी।
एक बार वो तलवार उठानी है जिससे हल्दीघाटी मे लाखो लाशे गिरी थी।

जीनके दिल कमजोर है वो हमसे परे जाओ।
बचे हुए सब क्षत्रीय धर्म मे खरे हो जाओ।

हमे तो बस क्षत्रिय धर्म और सँस्कार को अपनाना है।
ओर अपने राम राज्य को वापस लाना है।
जय क्षात्र धर्म॥
जय क्षत्रीय॥
हरीनारायण सिँह राठौङ
क्षत्रीयोँ के लिये:-
क्षत्रीयोँ को डुबोने वाली तीन:-
दारु ,दोगङ ,दगा॥

क्षत्रीयोँ के लिये जरुरी तीन:-
सँस्कार ,शौर्य ,क्षात्र धर्म॥

क्षत्रीयोँ को प्रिय तीन:-
न्याय ,नमन , आदर ॥

क्षत्रीयो को अप्रिय तीन:-
अपमान,विश्वाशघात,अनादर॥

क्षत्रीयोँ को महान बनाने वाले तीन:-
शरणागतरक्षक,दयालूता,परोपकार॥

क्षत्रीयोँ के लिये अब जरुरी तीन:-
एकता ,सँस्कार ,क्षत्रीय धर्म पालन॥

क्षत्रीयो के लिये छोङने वाली तीन:-
दारु ,कुप्रथायेँ ,आपसी मनमुटाव॥

क्षत्रीयोँ को जोङने वाली तीन:-
गोरवशाली ईतिहास,परम्पराएँ हमारे आदर्श॥

जय क्षत्रीय एकता॥
जय क्षत्रीय॥
हरीनारायण सिँह राठौङ
क्षत्रियोँ की जरुरत ॥
चेतक पे चढके जब राणा ने हूँकार भरी है।
लगा एसा की जैसे शेँष नाग ने फुफकार करी है॥
धिन है वो माता जिसने राणा जैसे शेर को जन्म दिया।
काट काट दुश्मन को जिसने क्षत्रिय धर्म को बुलन्द किया॥
सोने की थाली मे खाने वाला पातल मे घास की रोटी खा गया।
क्षत्रिय शेरो कि सन्तान है हम फिर ये कायरता का बोद्ध कँहा से आ गया।
या तो हम बदले या समय के फेर ने हमे बदल दिया।
कायर बन गये हम,क्योकी अपने सँस्कारो का हमने कतल किया॥
जब गर्जता था क्षत्रिय शेर दुश्मन की छाती काँपती थी।
लहराता था तलवार को जो सीधे दुश्मन का सीना नापती थी॥
कुछ शराब ने बदला और कुछ गैरो की सँगत ने हमे धौका दिया।
कुछ अँहकार ने ठगा और टाँग खीचाँई ने तो पुरा बाँटने का मौका दिया।
सँभल जाऔ और एक हो जाऔ क्षत्रियोँ अभी तो वक्त है।
कुछ बिगङ नहीँ सकता हमारा जब तक नषोँ मे क्षत्रिय वीरो का रक्त है॥
राजपुती शान की खातिर हमे क्षत्रिय धर्म कबूल करना होना।
जिस जिस ने बाँटा हमे,उनसे तो सूद समेत वसूल करना होगा॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षत्रिय ॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
जब क्षत्रिय शाषन करता था।
तो पुरा जगत भारत से डरता था॥

धीरे धीरे क्षत्रिय धर्म का लोप हुआ।
तब से अधर्मीयोँ का यँहा प्रकोप हुआ।

क्षत्रियोँ ने अपने धर्म और सँस्कारो को जब से छोङा है।
राम की मर्यादा और सत्य के बन्धन को जब से हमने तोङा है॥

जब से दुनीयाँ हमारा अपमान खुलेआम करती है।
भुगत रही है जनता आतँक की टोलीया उनका कत्ल खुलेआम करती है॥

लाखो तारो से भी एक सूरज का तेज भारी है।
क्योकी पथ नहिँ बदला है सुर्य देव ने इसिलिये उनका तेज आजतक जारी है॥

आह्रवान करता हु अपनालो क्षत्रिय धर्म और सँस्कारो को।
उठालो हनुमान की तरह बीङा देश से बाहर कर दो देश के गद्दारो को॥

जिस दिन सोया हुआ क्षात्र धर्म जाग जायेगा।
पाप, अधर्म और अन्याय अपने आप देश छौङ के भाग जाएगा॥
जय क्षत्रिय धर्म॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय भारत माता॥
हरीनारायण सिँह राठौङ