शेरो की दहाङ आज भी वेसी ही है,
गाय के दुध मे मिठास आज भी वेसी ही है।
कोयल आज भी मीठी वाणी बोलती है,
पपीहे की पीहू कानो मे शहद घोलती है।
सूरज वही,चँदा वही धरती माता भी वही है।
नदीया, झरने और पर्वत भी अपनी जगह पे सही है।
तो फिर क्षत्रियो की आन, बान और शान कँहा गई है ??
क्योकी-
हमने क्षत्रिय पथ के सारे बन्धन तोङ दिये।
धर्म नीती और सँस्कार सब हमने छोङ दिये।
नेता बन गये,अँहकार मे तन गये, अपना पराया सब भूल रहे।
मुठ्ठी भर नोटो की खातिर गेरो की बाहो मे देखो झूल रहै।
पहले छल,कपट और दारु ने हमारी कमर को तोङ दिया।
जिनको चुना नेता अपना अब उन्होने भी साथ को छोङ दिया।
अब भाई से भाई को जोङ देँगे,झुठे अँहकार को तोङ देँगे।
आँधियो के रूख को मोङ देँगे, उँगली उठाये अपनी तरफ उस उँगली को तोङ देँगे।
एक हमे अब होना है,खो चुके बहूत और कुछ नही अब खोना है।
॥जय क्षात्र धर्म॥
आपका-हरिनारायण सिँह राठौङ खुडियाला
गाय के दुध मे मिठास आज भी वेसी ही है।
कोयल आज भी मीठी वाणी बोलती है,
पपीहे की पीहू कानो मे शहद घोलती है।
सूरज वही,चँदा वही धरती माता भी वही है।
नदीया, झरने और पर्वत भी अपनी जगह पे सही है।
तो फिर क्षत्रियो की आन, बान और शान कँहा गई है ??
क्योकी-
हमने क्षत्रिय पथ के सारे बन्धन तोङ दिये।
धर्म नीती और सँस्कार सब हमने छोङ दिये।
नेता बन गये,अँहकार मे तन गये, अपना पराया सब भूल रहे।
मुठ्ठी भर नोटो की खातिर गेरो की बाहो मे देखो झूल रहै।
पहले छल,कपट और दारु ने हमारी कमर को तोङ दिया।
जिनको चुना नेता अपना अब उन्होने भी साथ को छोङ दिया।
अब भाई से भाई को जोङ देँगे,झुठे अँहकार को तोङ देँगे।
आँधियो के रूख को मोङ देँगे, उँगली उठाये अपनी तरफ उस उँगली को तोङ देँगे।
एक हमे अब होना है,खो चुके बहूत और कुछ नही अब खोना है।
॥जय क्षात्र धर्म॥
आपका-हरिनारायण सिँह राठौङ खुडियाला
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