गुरुवार, 1 अगस्त 2013

धिन है वो माता जिसने राणा जेसे शेर को दुध पिलाया था।
काट काट दूश्मन को जिसने क्षात्र धर्म को बचाया था।

धिन है हल्दीघाटी की वो माटी जिसका तिलक राणा ने लगाया था।
धिन है राणा की वो छाती जिसने बेरी से मिले भाई को गले लगाया था।

धिन है चितौङ का वो गढ जँहा राणा ने केशरीया लहराया था।
धिन धिन है वो चेतक जिसपे चढ के राणा ने घमासान मचाया था।

धिन है राणा का वो भाला जिसै राणा ने रण मे सम्भाला था।
धिन है वो तलवार जिसको राणा ने म्यान से निकाला था।

राणा की पाग की महीमा मे कर नहि सकता ।
ईतनी ऊँची शान है उस पाग की मेरे शब्दो से मे भर नही सकता।

उस पाग की महीमा मे क्या करु,जिसे झुकाने को अकबर सारे जतन कर गया।
झुका तो वो नही सका, पर ईसे वो अकबर नमन कर गया।

धिन धिन है भारत की ये भुमी जँहा राणा ने अवतार लिया।
नारायण नमन करे राणा को,जिसने क्षात्र धर्म का जयकार किया।
॥जय क्षात्र धर्म॥
हरीनारायण सिँह राठोङ

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