क्षत्रियोँ की जरुरत ॥
चेतक पे चढके जब राणा ने हूँकार भरी है।
लगा एसा की जैसे शेँष नाग ने फुफकार करी है॥
धिन है वो माता जिसने राणा जैसे शेर को जन्म दिया।
काट काट दुश्मन को जिसने क्षत्रिय धर्म को बुलन्द किया॥
सोने की थाली मे खाने वाला पातल मे घास की रोटी खा गया।
क्षत्रिय शेरो कि सन्तान है हम फिर ये कायरता का बोद्ध कँहा से आ गया।
या तो हम बदले या समय के फेर ने हमे बदल दिया।
कायर बन गये हम,क्योकी अपने सँस्कारो का हमने कतल किया॥
जब गर्जता था क्षत्रिय शेर दुश्मन की छाती काँपती थी।
लहराता था तलवार को जो सीधे दुश्मन का सीना नापती थी॥
कुछ शराब ने बदला और कुछ गैरो की सँगत ने हमे धौका दिया।
कुछ अँहकार ने ठगा और टाँग खीचाँई ने तो पुरा बाँटने का मौका दिया।
सँभल जाऔ और एक हो जाऔ क्षत्रियोँ अभी तो वक्त है।
कुछ बिगङ नहीँ सकता हमारा जब तक नषोँ मे क्षत्रिय वीरो का रक्त है॥
राजपुती शान की खातिर हमे क्षत्रिय धर्म कबूल करना होना।
जिस जिस ने बाँटा हमे,उनसे तो सूद समेत वसूल करना होगा॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षत्रिय ॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
चेतक पे चढके जब राणा ने हूँकार भरी है।
लगा एसा की जैसे शेँष नाग ने फुफकार करी है॥
धिन है वो माता जिसने राणा जैसे शेर को जन्म दिया।
काट काट दुश्मन को जिसने क्षत्रिय धर्म को बुलन्द किया॥
सोने की थाली मे खाने वाला पातल मे घास की रोटी खा गया।
क्षत्रिय शेरो कि सन्तान है हम फिर ये कायरता का बोद्ध कँहा से आ गया।
या तो हम बदले या समय के फेर ने हमे बदल दिया।
कायर बन गये हम,क्योकी अपने सँस्कारो का हमने कतल किया॥
जब गर्जता था क्षत्रिय शेर दुश्मन की छाती काँपती थी।
लहराता था तलवार को जो सीधे दुश्मन का सीना नापती थी॥
कुछ शराब ने बदला और कुछ गैरो की सँगत ने हमे धौका दिया।
कुछ अँहकार ने ठगा और टाँग खीचाँई ने तो पुरा बाँटने का मौका दिया।
सँभल जाऔ और एक हो जाऔ क्षत्रियोँ अभी तो वक्त है।
कुछ बिगङ नहीँ सकता हमारा जब तक नषोँ मे क्षत्रिय वीरो का रक्त है॥
राजपुती शान की खातिर हमे क्षत्रिय धर्म कबूल करना होना।
जिस जिस ने बाँटा हमे,उनसे तो सूद समेत वसूल करना होगा॥
जय क्षत्रिय एकता॥
जय क्षत्रिय ॥
हरिनारायण सिँह राठौङ
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