बुधवार, 14 अगस्त 2013

पी दारु गेला हुओ , जद हँसे दूनीया रा लोग।
घर ग्रस्ती मे विगन पङै और शरीर मे लागे घणा रोग॥

कईयो रा घर गया , अर कईयोँ रा गया टाबरीया।
कई तो जिन्दगी सूँ गया, पर ए पीवणियाँ नी सुधरीया॥

लाख टका रो मानवी , करोङ टका रो मान।
दारु पी रोळा करे ,हो जा खोटे टके समान॥

तन गळे ,धन रुळे अर मिनख रेवे आगा।
दारु पी गलीयाँ मे पङे जद कुत्ता लारे लागा

मिनख पणो राखणो,नी पीणो ओ दारु ।
कङवो घूँट पी लेवणो , घर टाबरीयाँ सारु॥

नारायण के सुणलो भायाँ, दारु नी पीवणो ।
नीरोगो
शरीर रेवसी , ईज्जत सूँ होसी जीवणो 
हरिनारायण सिँह राठौङ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें